- चतुर्थ भाव के नाम : सर्वार्थ चिन्तामणिः शौर्य (शूरता), कर्ण (कान), सुख, जल, बन्धु (सुख-सुविधाएँ, मित्र एवं सम्बन्धी), रसातल (नादिर), हिबुक (वक्ष स्थल), वेश्म (निवास), पाताल (नादिर), हृद् (हृदय), वाहन (सवारी), मातृ (माता)। फल दीपिकाः गृह, भू, मामा, भान्जा, एक सम्बन्ध, एक मित्र, वाहन, माता, राज्य, गाय, भैंस, इत्र, वस्त्र, आभूषण नादिर, हिबुक, सुख (प्रसन्नता), जल, सेतु एवं नदी। जातक पारिजातः पाताल, वृद्धि, हिबुक, क्षिति (भू), मातृ (माता), विद्या (ज्ञान), यान (वाहन), अम्बु (जल), गेह (गृह), सुख (प्रसन्नता), बन्धु (सम्बन्ध) एवं चतुष्ट्य। जातक अलंकार : अम्बा (माता), पाताल (नादिर), तुर्य, हिबुक, गृह, सुहृद् (मित्र), वाहन (सवारी), यान, बन्धु (सम्बन्ध), अम्बु (जल), नीर एवं जल। होरा सारः बन्धु (सम्बन्धी), हिबुक, सुख (प्रसन्नता), वेश्म (निवास), पाताल (भूमिगत) एवं वारि (जल)।
- चतुर्थ भाव चार भावों में से एक है जो केन्द्र, कंटक या चतुष्ट्य भी कहलाता है। यह उत्तम भावों में से एक है जो जातक के लिए मंगलकारी होगा। यह दो भावों में से एक है जिन्हें चतुरस्त्र या वर्गाकार भावों के नाम जानते हैं।
- चतुर्थ भाव के महत्त्वः चतुर्थ भाव के भाव कारक चंद्र व बुध हैं। पराशरः परिवहन, सम्बन्धी, मातृ, प्रसन्नता, कोष, भूमि, गृह। उत्तर कालामृतः विद्या, राज्य, गृह, यात्रा, वाहन जैसे रिक्शा व छोटी नौकाएँ, तैल-स्नान, मातृ, सम्बन्धी, मित्र, जाति, पहनावा, कुआँ, जल, दुग्ध, इत्र, खुश व्यक्ति, नेकनाम, जीवन रक्षिका औषधि, भरोसा, मिथ्या उक्ति, तंबू, विजय, थका देने वाला कार्य, भूमि व कृषि कार्य, एक उद्यान, कुएँ अथवा तालाब की खुदाई, जनोपयोग हेतु कुएँ, मातृ पक्ष, तीव्र बुद्धि, पिता, भार्या, धन का संचय, महलनुमा गृह, कला, गृह का शुभारम्भ, निष्कर्ष, व्यवस्था, किसी की सम्पत्ति का नष्ट होना, पैतृक सम्पत्ति, दैवीय भोजन, चुराई गई। सम्पत्ति के विषय में प्रकट करने की कला, वाल्मीक, वैदिक एवं पवित्र ज्ञान की प्रगति, भैंस, गाय, अश्व, गज, अधिशेष, अन्न, अनाज द्वारा उत्पादित, नम भूमि।
- सर्वाथ चिन्तामणिः गृह, धन-कोष, गुफाओं एवं अन्य छिद्रों में प्रवेश कना, श्रेष्ठ औषधियाँ, संवर्धित भूमि, क्षेत्र, फलोद्यान, मित्र, जल, पूर्वजों से सम्बन्धित धार्मिक अनुष्ठान, आवागमन, ग्राम, प्रसन्नता, अवनति, पद की हानि, लाभ, गृहप्रवेश, वृद्धि, माता-पिता, स्वदेश से सम्बन्धित कर्म एवं उनसे प्राप्त लाभ। होरा सारः किसी की सुविधाएँ (प्रसन्नता), सम्बन्धी, मानसिक प्रवृत्ति एवं मातृ।
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॥ ॐ गणेशाय नमः ॥
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Kumud Ranjan Mishra
Astrologer & Vastu Expert
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