सूत जी ने सौनक आदि ऋषियों से कहा कि, पूर्व समय में माँ गंगा के तट पर धर्मराज युधिष्ठिर महाराज ने जरासंघ के वध के लिये राजसूय यज्ञ को आरम्भ किया ॥1॥युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के सहित भीमसेन, अर्जुन आदि भाईयों के साथ अनेक रत्नों से शोभित मोती जड़ी हुई, स्वर्ग के तुल्य बड़ी विशाल यज्ञशाला बनवाई और उसके लिए सब राजाओं को अनेक प्रकार से जीतकर ले आये ॥2-3॥ एक समय गान्धारी और राजा धृतराष्ट्र का पुत्र, जो दुर्योधन नाम से विख्यात था, वह उस यज्ञशाला में आकर प्रांगण में जल की प्रतिमा देखकर, वस्त्र को ऊँचा कर उस जगह धीरे-धीरे चलने लगा ॥4-5॥ यह देखकर द्रौपदी आदि श्रेष्ठ स्त्रियाँ हँसने लगीं और दुर्योधन आगे जल को भूमि जानकर उसमें गिर गया ॥6॥ यह देख सब राजा लोग तथा तपरूप धनवाले ऋषिगण और द्रौपदी आदि सुंदर नेत्र वाली स्त्रियां भी हँसने लगी ॥7॥यह देखकर महाराजाधिराज दुर्योधन अत्यन्त क्रोधित होकर अपने मामा शकुनि के साथ अपने राज्य में जाने के लिए उद्यत हुआ ॥8॥ उस समय शकुनि ने अत्यन्त मधुर वचन कहा-हे राजन् ! आगे बहुत कार्य करना है इसलिए आप महाक्रोध का त्याग करें ॥9॥ हे राजेन्द्र ! यज्ञशाला से अपने घर जाने के लिये उठिये। तब " ऐसा ही सही" यह कहकर दुर्योधन यज्ञशाला से घर चला आया ॥10॥
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॥ ॐ गणेशाय नमः ॥
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Kumud Ranjan Mishra
Astrologer & Vastu Expert
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