सूत जी ने सौनक आदि ऋषियों से कहा कि, पूर्व समय में माँ गंगा के तट पर धर्मराज युधिष्ठिर महाराज ने जरासंघ के वध के लिये राजसूय यज्ञ को आरम्भ किया ॥1॥
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्णचन्द्र के सहित भीमसेन, अर्जुन आदि भाईयों के साथ अनेक रत्नों से शोभित मोती जड़ी हुई, स्वर्ग के तुल्य बड़ी विशाल यज्ञशाला बनवाई और उसके लिए सब राजाओं को अनेक प्रकार से जीतकर ले आये ॥2-3॥
एक समय गान्धारी और राजा धृतराष्ट्र का पुत्र, जो दुर्योधन नाम से विख्यात था, वह उस यज्ञशाला में आकर प्रांगण में जल की प्रतिमा देखकर, वस्त्र को ऊँचा कर उस जगह धीरे-धीरे चलने लगा ॥4-5॥
यह देखकर द्रौपदी आदि श्रेष्ठ स्त्रियाँ हँसने लगीं और दुर्योधन आगे जल को भूमि जानकर उसमें गिर गया ॥6॥
यह देख सब राजा लोग तथा तपरूप धनवाले ऋषिगण और द्रौपदी आदि सुंदर नेत्र वाली स्त्रियां भी हँसने लगी ॥7॥
यह देखकर महाराजाधिराज दुर्योधन अत्यन्त क्रोधित होकर अपने मामा शकुनि के साथ अपने राज्य में जाने के लिए उद्यत हुआ ॥8॥
उस समय शकुनि ने अत्यन्त मधुर वचन कहा-हे राजन् ! आगे बहुत कार्य करना है इसलिए आप महाक्रोध का त्याग करें ॥9॥
हे राजेन्द्र ! यज्ञशाला से अपने घर जाने के लिये उठिये। तब " ऐसा ही सही" यह कहकर दुर्योधन यज्ञशाला से घर चला आया ॥10॥
सब राजागण भी यज्ञशाला से अपने-अपने राज्यों में चले गये। तदनन्तर दुर्योधन ने हस्तिनापुर जाकर अन्य राजाओं के साथ पाण्डु के श्रेष्ठ पुत्र युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन आदि को द्युत क्रीड़ा के लिये बुलाकर, जुआ खेल खेलने लगा ॥11-12॥
द्युत क्रीड़ा में उसने (दुर्योधन) छल से, पांडवों का सम्पूर्ण धन और राज्यादिक जीत लिया। तदनन्तर भ्राताओं सहित युधिष्ठिर महान् विपत्तियों को प्राप्त हो, जंगलों के वनचर के बीच, जो भिल्लादिक हैं, उनके सदृश रहने लगे ।॥13॥
पाण्डवों के इस समाचार को सुनकर श्री कृष्ण वहाँ गये ॥14॥
सूतजी ने शौनकादिक ऋषियों से कहा कि, दुःख से अत्यन्त दुर्बल पाण्डव लोग वन में रहते थे। महात्मा श्रीकृष्णचन्द्र को देखकर क्रम से पूजनादिक और प्रणाम कर राजा युधिष्ठिर बोले- हे प्रभो ! भाइयों सहित हमको यह दारुण दुःख प्राप्त हुआ है। इस दुःखरूपी सागर से हम कैसे छुटकारा पायेंगे सो कहिए ॥15-16॥
हम कौन से उत्तम देवता का पूजन करे। अथवा कौन सा व्रत करें। जिससे हमको राज्य मिले ? हमारा हित तो आप ही की कृपा से होगा ॥17॥
ऐसा सुनकर श्रीकृष्ण भगवान् बोले- हे युधिष्ठिर पुरुषों और स्त्रियों के समस्त पापों को नष्ट करने वाला अत्यन्त उत्तम एक अनन्त नामक व्रत है ।॥18॥
जो भाद्रपद मास में शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि को होता है। उस व्रत के अनुष्ठान मात्र से सम्पूर्ण पापों का नाश हो जाता है। ॥19॥
ऐसा सुनकर राजा युधिष्ठिर ने कहा- हे वासुदेव, आपने जो अनन्त व्रत कहा वह क्या शेषनाग का अथवा अनन्त नाम के नक्षत्र का व्रत है? ॥20॥
या अनन्त परब्रह्म का यह व्रत है। हे केशव ! यह अनंत किस देवता का नाम है, वह सत्य-सत्य कहिये ? ॥21॥
ऐसा सुनकर श्रीकृष्ण भगवान बोले - हे धर्मराज ! अनंत हमारा ही नाम है, इसे हमारा ही स्वरूप जानो, सूर्य आदि जितने देवता हैं और कालादि जो कहे जाते हैं, सब हमको ही जानो ।॥22॥
कला, काष्ठा, मुहूर्त आदि दिन, रात्रि तथा यह सब जितने शरीरवान् प्राणी हैं तथा पक्ष, मास, ऋतु, वर्ष, युग और कालादि की व्यवस्था सब मुझी को जानो ॥23॥
यह जो मैंने कालादि कहा है, वह इस अनंत नाम से प्रसिद्ध है। वही मैं भूमि का भार अल्प करने के लिए इस कृष्ण नाम से अवतरित हूँ ।॥24॥
दानवों का नाश तथा साधु पुरुषों की रक्षा के निमित्त मुझे वसुदेव के कुल में भी उत्पन्न जानो ।॥25॥
आदि अंत मध्य जिसका नहीं ऐसे कृष्ण, विष्णु, शिव, वैकुण्ठ, सूर्य, चन्द्र, सर्वत्र व्याप्त ईश्वर मुझको जानो। ॥26॥
हे युधिष्ठिर! नहीं है उत्तम जिससे ऐसा विश्वरूप जो योगी लोगों से ध्यान किया गया वह सम्पूर्ण रूप वाले अनंत हम हीं हैं। जिससे चौदह इंद्र, आठ वसु, बारह सूर्य, ग्यारह रुद्र, सात ऋर्षि, सात समुद्र तथा वृक्षादि सहित सम्पूर्ण पर्वत हम हीं को जानो। ॥27-28॥
सत्ताइस नक्षत्र, दस दिशा, पृथ्वी, सात पाताल तथा भूर्भुवादि सात स्वर्ग यह सब हम ही हैं, इस विषय में कुछ भी संदेह न करो। ॥29॥
ऐसा वचन सुनकर राजा युधिष्ठिर बोले- हे सर्वव्यापी भगवन् ! अनन्त व्रत का माहात्म्य तथा विधि कहिये। अनन्त व्रत का अनुष्ठान करने वाले प्राणी को क्या पुण्य और क्या फल मिलता है वह भी कहिये। ॥30॥
पूर्वकाल में यह अनन्त व्रत किसने किया और मृत्युलोक में किसने प्रकाशित किया ? यह सब विस्तार पूर्वक हमसे कहिये। ॥31॥
युधिष्ठिर का ऐसा वचन सुनकर भगवान श्रीकृष्ण बोले- सत्ययुग में सुमन्त नाम का एक ब्राह्मण था। उसने वशिष्ठ गोत्र में उत्पन्न सुन्दर दीक्षा नाम की भृगु ऋषि की कन्या के साथ वेदोक्त विधि से विवाह किया। हे राजन् ! दीक्षा नाम की स्त्री से समय पाकर अनेक सुन्दर लक्षणों से युक्त एक कन्या उत्पन्न हुई ॥32-33॥
वह शीला नाम की अत्यन्त सुशीला कन्या पिता के घर बढ़ने लगी। उसकी पतिव्रता माता काल ज्वर से दुःखी हो ॥34॥
नदी के जल में प्राण त्याग कर स्वर्ग को चली गई, तदनन्तर उस सुमन्तु नामक ब्राह्मण ने धर्म नाम की एक दुःशीला नाम की कन्या से विधि-विधान पूर्वक विवाह किया। वह स्त्री नाम के सदृश दुष्ट स्वभाव, कर्कश वचन बोलने वाली और बड़ी प्रचण्ड थी।॥35-36॥
वह शीला नाम की कन्या पिता के घर गृहकार्य करने में बड़ी चतुर थी। वह आँगन, बाहर, दरवाजे के ऊपर और देहली के ऊपर स्वस्तिक, शंख, कमल के नीले, सफेद और काले अनेक प्रकार के चिन्हों को लिखकर देखा करती थी ॥37-38॥
इसके अनन्तर इसी तरह बहुत दिन बीतने पर कौमारावस्था में प्राप्त वह शीला पिता के घर में बड़ी मङ्गल देनेवाली हुई। ॥39॥
उसको देखकर पिता सोचने लगे कि हम यह कन्या पृथ्वी में किस गुणवान् वर को दें, ऐसा विचारकर वे दुःखी हुए। ॥40॥
उसी समय उत्तम वेद-वेदांग जानने वाले कौण्डिन्य नाम के मुनि कन्या के लिये आये। ॥41॥
वे (मुनि) बोले कि तुम्हारी गुणयुक्ता कन्या से मैं विवाह करना चाहता हूँ। ऐसा सुनकर पिता ने शुभ दिन में ब्राह्मणों में इन्द्र तुल्य कौण्डिन्य मुनि को अपनी कन्या दे दी। ॥42॥
श्रीकृष्ण जी ने कहा हे धर्मराज! सुमन्तु ने वेद विधि से उसका विवाह कर दिया। उस समय वहाँ पर स्त्रियाँ गीत गाने लगी। ॥43॥
और ब्राह्मण लोग स्वस्तिवाचन करने लगे। बन्दी जय-घोष करने लगे। इस प्रकार विवाह कर सुमन्तु ब्राह्मण अपनी कर्कशा स्त्री से बोला-दामाद के सन्तोष के लिए कुछ द्रव्यादि दहेज में देना चाहिये, ऐसा सुनकर वह कर्कशा क्रोध से घर की शोभा बिगाड़ कर, सम्पूर्ण द्रव्यादि एक पेटी में अच्छी तरह बंद कर दामाद से बोली कि आप अपने घर जाइये। हमारे घर में कुछ भी द्रव्य नहीं है। यदि विश्वास न हो तो देख लीजिये। ॥44-46॥
श्रीकृष्ण जी ने कहा- हे पार्थ ! ऐसा सुनकर वे मुनि उदास हुए और वह कन्या भोजन से बचे हुए अन्नादि को मार्ग में खर्च करती गई। ॥47॥
कौण्डिन्य मुनि भी उस सुमन्तु की कन्या शीला को बैलगाड़ी पर बिठाकर शनैः शनैः चलने लगे। ॥48॥
जाते-जाते पुण्यदायक यमुना नदी को देखकर उसके किनारे रथ खड़ा कर शिष्यों को नियुक्त कर वे स्नान-संध्यादि करने गये। ॥49॥
मध्याह्न के समय भोजन का समय जानकर रथ से उतर नदी के किनारे उस शीला ने लाल वस्त्र पहने हुए स्त्रियों के झुण्ड को देखा। ॥50॥
उन स्त्रियों के समूह को चतुर्दशी के दिन श्रीजनार्दन भगवान का पूजन करते हुए देख उनके पास जा उन स्त्रियों से शीला धीरे से पूछने लगी। ॥51॥
तुम लोग यह क्या कर रही हो ? इस व्रत का क्या नाम है? ऐसा सुनकर शील ही है श्रृंगार जिसका, ऐसी उस शीला से वे स्त्रियाँ बोली। ॥52॥
यह अनंत का व्रत है, हम अनंत भगवान को ही पूजते हैं। ऐसा सुनकर शीला बोली- मैं भी यह उत्तम व्रत करूँगी ॥53॥
इस अनन्त व्रत की क्या विधि है और यह व्रत किस प्रकार का है? इसमें क्या दान होता है? कौन देवता पूजे जाते हैं। वह मुझसे कहो? ॥54॥
ऐसा सुनकर वे स्त्रियाँ बोलीं- हे शीले ! उत्तम अन्न को प्रस्थमात्र (एक सेर) लेकर मालपुआ आदि पकवान बनाकर आधा ब्राह्मण को देवे और आधा स्वयं भोजन करे ॥55॥
फिर कृपणता ना करते हुए शक्ति के अनुसार दक्षिणादेवे और यह व्रत नदी के तीर पर करे और भगवान हरि की कथा सुने ॥56॥
कुशा के शेषनाग को बनाकर बाँस के पात्र में रखकर फिर स्नान कराकर मण्डप के भीतर भगवान का सविधि पूजन करे, चंदन, पुष्प, धूप, दीप और अनेक प्रकार के नैवैद्य आदि मिष्ठान्न सहित रखे ॥57॥
उनके आगे मजबूत सूत का डोरा, केशर रंग में रंगकर चौदह गाँठे देकर बायें हाथ में बाँधे ॥58॥
प्रथम यह स्मरण करे कि, हे वासुदेव ! नहीं है अन्त जिसका, ऐसे संसाररूपी महासागर में डूबे हुए हुए मेरी अच्छी तरह उद्धार करो और अपने अनन्त रूप में लीन करो। हे सूत्र रूपी अनन्त भगवन् ! आपको बारम्बार नमस्कार है ॥59॥
ऐसा स्मरण कर सूत्ररूपी अनन्त भगवान को बायें हाथ में बाँधकर स्वस्थ चित्त हो भोजन करे। संसाररूपी अनन्त नारायण भगवान का ध्यान कर भोजन करें तथा अपने घर जायें ॥60॥
हे भद्रे, यह व्रत तुमसे कहा। भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से बोले – हे राजेन्द्र ! प्रसन्न चित्त से ऐसा व्रत-विधान सुनकर शीला भी सुंदर डोरे को हाथ में बाँध व्रत करने लगी। जैसा चौदह गाँठ देकर बायें हाथ में बाँधना कहा है वैसा बाँध कर अपने भोजन का आधा ब्राह्मण को दे अवशेष स्वयं खाकर फिर प्रसन्न हो पति के साथ बैलगाड़ी द्वारा अपने घर को गयी, तब से शुभ शकुनों पर विश्वास हो गया। ॥61-63॥
वह अनन्त व्रत करने से शीला का घर गोधन और धन-धान्यादि से भरपूर हो गया। ॥64॥
वह सोने में ग्रथित माणिक्य और मोतियों के हारों से भूषित और अतिथि-पूजन में सर्वदा व्याकुल रहती थी। ॥65॥
सुख से रहकर वह मणियुक्त करधनी तथा मोतियों की मालाओं से अलंकृत घर में पति के साथ उत्तम वस्त्र पहिन सावित्री के समान शोभित होने लगी। ॥66॥
किसी समय पति ने बैठी हुई शीला के हाथ में बँधा सुंदर डोरा देखा। ॥67॥
और शीला से बोला कि, हे शीले ! डोरा क्या तूने मुझे वश में करने के लिए बाँधा है? इसका कारण कहो ॥68॥
ऐसा सुनकर वह शीला बोली कि, जिसके प्रसाद से सम्पूर्ण धन-धान्य, सम्पदा मनुष्य को मिलती है, वही यह अनन्त हमने धारण किया है। ॥69॥
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- लक्ष्मी के मद में अन्धा होकर शीला के ब्राह्मण पति ने शीला के वचन को सुनकर उसके बाँह के डोरे को जल्दी से तोड़ दिया।॥70॥
और अनन्त कौन है? ऐसा कहते हुए, पापकर्म करते हुए मूर्ख ने डोरा अग्नि की ज्वाला में डाल दिया। उधर शीला व्याकुल होकर हाहाकार करती हुई दौड़ी। ॥71॥
उसने डोरे को लेकर दूध में डाल दिया। इस पापकर्म से उसकी वह लक्ष्मी नष्ट होने लगी ॥72॥
गौ आदि चोर ले गये, घर में आग लग गई, सब धन नष्ट हो गया, जो जिस तरह से धन आया था, उसी तरह फिर चला गया ।॥73॥
इसी तरह कुटुम्ब में भी कलह होने लगी, भाइयों में लड़ाई होने लगी, अनन्त को फेंकने के पाप से उसकी घर में दरिद्रता घुस गयी ॥74॥
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे युधिष्ठिर! उसके साथ संसार में कोई बात-चीत नहीं करता था, वह शरीर से अति संतप्त हो गया और मन से भी दुःखी रहता था ॥75॥
बड़े भारी दुःख को पाकर कौण्डिन्य मुनि ने अपनी पत्नी शीला से कहा- हे शीले ! एकाएक उत्पन्न इस शोक के कारण मैं दुःखी हो गया और मेरा धन नष्ट हो गया ॥76॥ स्वजनों से कलह होती है और मुझसे कोई बात नहीं करता है ॥77॥
शरीर में नित्य ज्वर आदि ताप रहते है, चित्त में बड़ा ही खेद होता है, इसका क्या कारण है ? तुम जानती हो तो कहो। क्या उपाय है जिससे मेरा भाग्य अच्छा हो ॥78॥
ऐसा सुनकर शील ही है आभूषण जिसका, ऐसे सुंदर स्वभाव वाली शीला पति से बोली- अनन्त फेंकने के पाप कर्म से यह सब हुआ है ॥79॥
हे महाभाग ! उसके लिए उपाय करें, तब फिर सब ठीक हो जायेगा। ऐसा उसके कहने से ब्राह्मण मन से हरि भगवान् की शरण में गया ।॥80॥
उसके अनन्तर वह कौण्डिन्य मुनि खेद को प्राप्त हो वन में गये, वहाँ वे उत्तम ब्राह्मण, वायु का भक्षण कर तप करने की इच्छा से उस परमेश्वर का ध्यान करते हुए सोचने लगे कि जिसके प्रसाद से मुझे धनादिक मिला और उसके अपमान करने से मैं निर्धन होकर कष्ट को प्राप्त हो गया। मुझको अतिशय सुख-दुःख देने वाले परमेश्वर अनंत कहाँ हैं। ऐसा चिन्तन करते हुए वह गहन वन में घूमने लगे ॥81-83॥
वहीं पर फला - फूला एक आम वृक्ष देखा। वह ऐसा था जिस पर एक भी पक्षी नहीं थे और करोड़ों- कीड़े थे ॥84॥
उसने आम के वृक्ष से पूछा कि, कहीं अनन्त भगवान् को देखा हो तो हे सौम्य ! कहो? मेरे चित्त में अतिशय दुःख है ॥85॥
यह सुनकर वह आम का वृक्ष बोली- हे ब्राह्मण! मैंने अनन्त भगवान् को नहीं देखा है। यह सुनकर वह दुःखी होकर चल दिया और अनन्त भगवान् को कहाँ देखेंगे? ऐसा विचार करता हुआ घूमने लगा। इतने में बछड़े सहित गौ को देखा, जो वन के मध्य में इधर-उधर दौड़ रही थी ॥86-87॥
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- हे पाण्डव ! वह ब्राह्मण गौ से बोला कि, तुमने अनन्त भगवान् को देखा हो तो बताओ? इसके बाद गौ बोली कि, हे कौण्डिन्य ! मैं अनन्त भगवान् को नहीं जानती हूँ ॥88॥
उसके बाद आगे जाकर घास पर बैठे हुए वृषभ को देखकर उससे पूछा कि, हे गौपति ! तुमने अनन्त भगवान् को देखा है ? ॥89॥
बैल बोला- मैंने अनन्त भगवान् को नहीं देखा है। इसके बाद आगे जाकर बड़ी सुंदर दो पुष्करिणी को देखा।॥90॥
उन तालाबों का जल उसमें से इसमें और इसमें से उसमें आता-जाता हुआ अनेक प्रकार का कल्लोल करता और कमल, कहार, कुमुदिनी आदि के पत्तों से युक्त होकर शोभायमान हो रहा है ॥91॥
भ्रमर, हंस, चकोर, बगुलादि पक्षियों से सेवित उस वापी को देख ब्राह्मण ने उन दोनों पुष्करिणियों से पूछा तुम लोगों ने अनन्त भगवान् को कहीं देखा है ? ॥92॥
यह सुनकर दोनों पुष्करिणी बोली हे द्विज! हमने अनन्त भगवान् को नहीं देखा। आगे जाकर उसी तरह एक हाथी और एक गर्दभ देखा ॥93॥ उन दोनों से भी ब्राह्मण ने पूछा- क्या आप लोगों ने कहीं अनन्त भगवान को देखा है ? ऐसा पूछकर ब्राह्मण निराश हो उसी जगह बैठ गया ।॥94॥
हे राजन् ! वह कौण्डिन्य जीवन से निराश हो बड़ा विकल होता हुआ बहुत गर्म ऊर्ध्वश्वाँस लेकर भूमि पर गिर पड़ा ॥95॥ फिर वह ब्राह्मण होश में आकर हे अनन्त ऐसा कहते कहते उठकर चित्त में यह निश्चय करता हुआ कि, अब मैं जरूर प्राण त्याग कर दूँगा ॥96॥
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा- हे धर्मराज ! उस ब्राह्मण ने प्राण देने के लिए वृक्ष में फाँसी लगा लिया। उसी समय दयार्द्र हृदय अनन्त भगवान् भी प्रत्यक्ष हो। ॥97॥
वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर बोले- यहाँ आओ। यह कहकर उस कौन्डिन्य का हाथ पकड़ कर गुफा में ले गये ॥98॥ उस गुफा में कौण्डिन्य मुनि ने एक नगर देखा। जिसमें बड़े ही स्वरूपवान् स्त्री-पुरुष विद्यमान थे और शुभदायक दिव्य सिंहासन पर भगवान् बैठे थे ॥99॥
जिनके अगल-बगल शंख, चक्र, गदा, पद्म और गरुड़ शोभायमान हो रहे थे। कौस्तुभमणि धारण किये बनमालादि अनेक प्रकार के आभूषण धारण किये हुए विश्वरूप अनन्त भगवान् को उस कौण्डिन्य मुनि ने देखा ॥100-101॥
अतिशय प्रकाशमान स्वरूपवाले भगवान् को देखकर उनके आगे ऊँचे स्वर से बोले- हे प्रभो! आपकी जय हो ॥102॥
ऐसा कहकर तथा प्रणाम कर बोला कि, हे नाथ! हे पुण्डरीकाक्ष ! हम पापरूप, पापकर्म करनेवाले हमारी आत्मा पापरूप है और हम पाप ही से उत्पन्न है, रक्षा करें। आप मेरे सम्पूर्ण पापों को हरने वाले हैं ।॥103॥
उस मुनि का वचन सुनकर, अनन्त देव भी बड़े कोमल वचन से बोले- हे विप्रेन्द्र ! मत डरो, जो तुम्हारे मन में हो कहो।॥104॥
ऐसा सुनकर कौण्डिन्य मुनि बोले- हे प्रभो! मैने धन से उन्मत्त हो अनन्त का डोरा तोड़ दिया, उस पापकर्म से मेरा धन नष्ट हो गया ।॥105॥
घर में अपने कुटुम्बियों से कलह होती है। जिस कारण मुझसे कोई भी नहीं बोलता। इस तरह दुःखी हो आपके दर्शन की इच्छा से मैं वनों में भटक रहा हूँ ।॥106॥
हे देवेन्द्र ! आपने कृपाकर अपना दर्शन दिया, अब मुझ पर दया करके उस पाप की शान्ति का उपाय कहिये ॥107॥
श्रीकृष्ण महाराज बोले- हे युधिष्ठिर ! भक्ति से प्रसन्न हो देवता क्या नहीं देते? ऐसा उत्तम ब्राह्मण का वचन सुनकर अनन्त भगवान् कहते हैं कि, हे कौण्डिन्य ! तुम विलम्ब मत करो, अपने घर जाओ और भक्ति से चौदह वर्ष तक अनन्त का व्रत करो। ॥108-109॥
इससे सम्पूर्ण पापों से छूटकर पुत्र-पौत्र को उत्पन्न कर इच्छित भोगों को भोग उत्तम सिद्धि को प्राप्त करोगे ॥110॥
अन्त में मेरा स्मरण कर मुझको बिना संदेह प्राप्त कर सकोगे। हम सम्पूर्ण लोकों के कल्याण के लिए तुमको वरदान देते है। यह शीला का अनन्त व्रतादिक श्रेष्ठ आख्यान और कल्याण करने वाला अनन्त व्रत जो प्राणी सुनकर किया करेंगे। ॥111-112॥
वे शीघ्र पापों से छूटकर परमगति को प्राप्त होंगे। अनन्त देव ने कहा- हे ब्राह्मण ! मेरे पास जिस मार्ग से तुम यहाँ आये हो उसी मार्ग से तुम जल्दी घर को जाओ ।॥113॥
ऐसा सुनकर कौंण्डिन्य मुनि बोले कि, हे स्वामिन् ! मैं जो पूछता हूँ उसे बतइये जंगल में घूमते-घूमते मैंने कुछ कौतुक देखा, हे जगत् गुरो ! वह कहो ॥114॥
वह आम का वृक्ष कौन था ? वह गौ कौन थी? वह वृषभ कौन था और कमल कुमुद कहार से सुशोभित परम सुंदर बड़े जंगल में मैंने दो पुष्करिणी देखी है सो क्या थी? वह गदहा कौन था ? वह हाथी कौन था और उत्तम वृद्ध ब्राह्मण कौन था? ॥115-116॥
अनन्त देव बोले- वह आम वृक्ष वेद-विद्या को अच्छी तरह जानने वाला ब्राह्मण था। उसने शिष्यों को विद्या नहीं दी इसलिए वह वृक्ष हुआ ॥117॥
और जो गौ देखी थी वह बीज को खानेवाली पृथ्वी रही और जो घास पर वृषभ देखा था, वह सत्यनारायण धर्म था।।118॥
और दोनों पुष्करीणी धर्म-अधर्म की व्यवस्था देखनेवाली थी, धर्म-अधर्म आदि जो कुछ भी परस्पर देती और लेती रहीं तथा वेद पाठ करने वाले ब्राह्मणों को नहीं दिया, भिक्षुओं को भिक्षा नहीं दी। उस पापकर्म से दोनों का जल आपस में इधर-उधर होता है।॥119-121॥
गदहा जो देखा वह क्रोध था और वह जो हाथी था सो अभिमान रहा, वह ब्राह्मण जो रहा सो अनन्त हम हैं और जो गुफा रही वह कठिन संसार था ।॥122॥
अनन्त देव ऐसा बतलाकर उसी जगह अन्तर्ध्यान हो गये। यह सब स्वप्न के समान देखकर उस जगह से मुनि अपने घर को आये ।॥123॥
और चौदह वर्ष तक अनंत व्रत कर जैसा अनन्त देव ने कहा था, वह सब सुख भोगकर अंत में वह अनन्त देव का स्मरण कर अनन्तलोक को चले गये। हे राजर्षि ! तुम भी यह कथा सुनो और व्रत करो ।॥124-125॥
जिस प्रकार ब्राह्मण को चौदह वर्ष में फल प्राप्त हुआ, तुमको भी उसी तरह अनन्त देव की कृपा से सब इच्छित वस्तु, एक ही वर्ष में कथा सुनकर व्रत करने से प्राप्त हो जायेगा। हे राजन् ! व्रतों में उत्तम व्रत मैंने कहा, जिसको सुन प्राणी सब पापों से छूटा जाते हैं। इसमें संदेह नहीं है और हरि चरणों को प्राप्त होते हैं । ॥ 126-128॥
हे कुरुकुल में उत्पन्न युधिष्ठिर ! जो शुद्ध विचार वाले प्राणी संसार रूपी गुफा में सुख से फिरने की इच्छा करते हैं वे तीनों लोकों के स्वामी अनन्तदेव का पूजन कर डोरे को दाहिने हाथ में बाँधते हैं।॥129॥