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द्वितीय भाव

  • द्वितीय भाव के नाम : फल दीपिकाः वित्त (सम्पत्ति), विद्या (ज्ञान), स्व, अन्नपन (धन-सम्पत्ति), भोजन एवं पेय पदार्थ, भुक्ति (भक्षण), दाहिना नेत्र (दखाक्षि), मुखमण्डल (आस्य), पत्र या प्रलेख (पत्रिका), भाषण (वाक्) एवं कुटुम्ब (परिवार)। जातक पारिजातः वाक् (भाषण), अर्थ (सम्पत्ति), भुक्ति (भोजन), नयन (नेत्र), स्व (सम्पदा) एवं कुटुम्ब (परिवार)। जातक अलंकारः स्व, कोष (धनकोष, सम्पत्ति), अर्थ, कुटुम्ब एवं धन | होरा सारः धन (सम्पत्ति), अर्थ (सम्पत्ति), वित्त (सम्पत्ति), कुटुम्ब (परिवार), वाक् (भाषण) एवं मंगल (शुभ)।
  • द्वितीय भाव उत्तम भावों में से एक है तथा जातक के लिए मंगलकारी होगा। यह भाव केन्द्र के पश्चात् आता है, एवं पणफर या सफल भाव के नाम से जाना जाता है।
  • द्वितीय भाव के महत्त्व : द्वितीय भाव का भाव कारक बृहस्पति है। पराशरः सम्पत्ति, अनाज, कुटुम्ब, मृत्यु, शत्रु, धातु, रत्न आदि। उत्तर कालामृतः वाणी, सम्पत्ति, धार्मिक परम्पराओं में आस्था, अन्यों के सहायक, नख, आनन्द, सत्य व असत्य, जिल्ला, चक्षु, वस्त्र, हीरा, ताम्र, रत्न, मोती, निर्धारण, क्रोध से उत्तेजित, कुटुम्ब, सम्बन्ध, व्यापार, वाणी की कोमलता, उदारता, धन प्राप्ति के प्रयास, मित्रता, मित्र, वैभव, व्यय में कृपणता, आनन्ददायक वाक्चातुरता, विद्वता, स्वर्ण, रजत, मक्का, नम्रता, वृद्धि की दृढता, निकट आश्रित, जीवन एवं मृत्यु का चक्र, जीवन शक्ति, वित्त ।
  • सर्वार्थ चिन्तामणिः माणिक्य (रुबी), मोती, रत्न, धातुरुप, कच्ची धातु, वस्तुएँ, वेष, स्वर्ण, ग्रह, रजत, अनाज, आदान-प्रदान, क्रय एवं विक्रय । होरा सारः सत्यता, दूरदर्शिता, सम्पत्ति ।।
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